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आगमवाणी- लीलावतारी मावजी महाराज की आगमवाणी का गान एवं श्री कृष्ण की द्वापरयुग में अधुरी रही रासलीला का वर्णन कुछ इस प्रकार से किया गया है। जो आप पाठकों के समक्ष साधारण शब्दों में परोसा जा रहा है।


      सर्वप्रथम तो आगमवाणी है क्या, इसके बारे में हमें जानना बहुत आवश्यक है। आगमवाणी में श्री माव मनोहर मावजी ने आगम का आशय - आने वाली एवं होने वाली, वाणी का आशय - बाते अर्थात् चमत्कार, भविष्य में होने वाली बाते अर्थात् चमत्कार जो आगे होने वाले है, मतबल यह है कि माव मनोहर ने अपने शास्त्रों में यह तक लिख दिया था। कि आगे जीवन मंे अर्थात् आने वाले समय में क्या क्या होगा। समय और वस्तुओं में कैसा कैसा परिवर्तन होगा। क्या क्या घटनाएं एवं परिघटनाएं होगी, कैसे कैसे लोग होगें, जो संत बनकर स्वंय को भगवान समझेगें, लोग स्वंय से ज्यादा उन ढोगीं व्यक्तियों के उपर भरोसा करेगें, उनको ही भगवान समझगें, उन्होने जो कहां वह पत्थर की लकीर मानी जाएगी। इस माव वाणी अर्थात् आगमवाणी के आधार पर आप सभी आज के इस कलयुग मंे देख ही रहे है। हमारे सामने कैसे कैसे ढोंगी पुरूष है, जो हवालात अर्थात् जैल की हवा खा रहे है। माव मनोहर श्री मावजी स्वंय ईश्वर है और इन्हे पहले से ही ज्ञात था कि आगे ऐसे कार्य होगें जो हमनेे सोचा नहीं होगा। आज के इस युग में पिता बेटे का नहीं, बेटा माता पिता का नहीं, भाई-भाई का नहीं, ऐसे ऐसे कृत्य हमारे सामने होगें कि व्यक्ति स्वंय अचंभित रह जाएगा। आगमवाणी का आशय ही यही है कि आगे क्या होगा अर्थात् क्या क्या होने वाला है।


संत मावजी ने अपनी माववाणी अर्थात् आगमवाणी मंे यह भी बताया है कि ऐसा घोर कलयुग आएगा, की माता-पिता अपने पुत्री को दुनिया में आने से पहले ही कोख में मार देगें जो हम सभी आज के इस घौर कलयुग में देख भी रहे है, एक बेटा अपने पिता की दिन दहाडंे जरा सा टोकने एवं कुछ कहने पर अपराध कर बेढता है। संत मावजी ने जो भविष्यवाणीयां की वो आज हम लोग मीडिया के माध्यम से देख रहे है। क्या हम सभी ने कभी सोचा था, लेकिन संत मावजी महाराज ने पहले से ही इन सभी बातों को अपने हाथों से लिखे हुए  माव शास्त्र में लिख दिया एवं मावजी महाराज के द्वारा जो भविष्यवाणीयां की गई वो आज हम सभी के सामने है जिसे हम भली भांति जानते है।   


जनश्रुती के अनुसार एवं आगमवाणी के आधार पर इस बात को स्वीकार किया गया है कि  मावजी महाराज भगवान श्री कृष्ण के अशांवतारी माने जाते है। मावजी की सारी लीलाएं श्री कृष्ण की भांती ही थी, जो साबला एवं बैणेश्वर धाम में पुरी की गई थी। जनश्रुति के अनुसार अर्थात् आगमवाणी एवं शास्त्रों के आधार पर भगवान श्री कृष्ण द्वापर युग में अपने सम्पूर्ण कार्य को पुरा करने के बाद जब राधिका एवं गोपियों के संग रास खेल रह थे उस रासलीला को खेलते समय राधिका के पालव यानी पल्लु पर एक घाव लिखा अर्थात् कुछ पंक्तिया लिखी जो इस प्रकार थी। यहां घाव का आषय पंक्तियों से है। कुछ पंक्तियां लिखी है जो इस प्रकार है।

बेणेश्वर से बैणकों,

सोम माही को घाट,

आबुदरों छे आद नो,

   त्या जो जो मारी वाट ।।

राधाजी के पालव यानी साडी के पल्लु पर जिन पंक्तियों को लिखा गया है, इससे यह स्पष्ट होता है कि वागड की धरती पर बैणेश्वर धाम है, बैणेश्वरधाम पर सोम और माही नदीयांें का संगम है, वही आबुदरा घाट हैं इस आबुदरा के घाट पर आकर मेरा इंतजार करना मैं वही पर मिलुंगा। भगवान श्री कृष्ण ने गोकुल के सभी ग्वाले मित्र, सभी गोपिया, राधिकाजी एवं नारदजी को इन पंक्तियों के माध्यम से संबोधित करते हुए कहां है। इन पंक्तियों को लिखने के बाद रास खलते हुए भगवान श्री कृष्ण अचानक से अन्र्तधान हो गये थे। इस प्रकार द्वापरयुग से राधिकाजी, सोलह हजार सोलह सौ गोपिया, गोकुल, वृंदावन के ग्वाले, वहां की गौ एवं अन्य सभी कई समय से श्री कृष्ण को देख नहीं पाये थे, तब सभी चिन्तन करने को मजबुर हो गये थे। आखिर श्री हरि गये तो कहंा गये, तब सारी गोपियां विलाप (दुःखी मन) करती है और अपनी करूण स्वर में गीत गाती हैै। और भाव प्रकट करती है कि.......................



अने अरे साम्मरीयाजी कहां गया रे,

        अमणे आय हता रे निरवाण।

        अने अरेक अमणे आय हता रे,

        पल में अलप थया रे निरवाण।

        अने अरेक कुदम (कदम्ब) ना जाड ने,

        सखीयों पुसण लागी वात।

        अने जणी वाटे मारो वालो गयो रे,

         तेणी वाटे कंकव ना पगला।

        अने अरेक आबुदरे जइये रे,

        सखीयों भक्ति करीये ने अपार।

अर्थः- भगवान श्री कृष्ण को मिलने के लिए सखियां विलाप करती है अर्थात् दुःखी मन से कहती है कि सखियां श्री हरि को मिलने एवं दर्शन करने के लिए इतनी अति विचलित हो जाती है कि सभी गोपिया मन ही मन श्री माव मनोहर मावजी महाराज से यह कह रही है, कि हे भगवन आप कहां चले गये, सभी गोपिया रस्ते में आये हर कदम्ब के वृक्ष पर देखती है कि भगवान कही कदम्ब के वृक्ष पर तो नहीं बेढे है, गोपियां एक दुसरे से आपस में कहती है कि जरा जमीन पर झुक कर भी देखना कहीं भगवान के पैरो की छाप तो नहीं पडी है, आखिरकार भगवान इसी रास्ते से गये होगें तो कुम कुम के निशान होगें। फिर से गोपियां आपस में बाते करती है ओर इस प्रकार से सभी अपने मन के भाव को श्री हरि तक पंहुचाने का प्रयास करती है।

इस गीत को पुरा करने के बाद सभी अंत में सभी नारदजी के पास पहुंचते है और नारदजी को सारी व्यथा बताते है तब नारद जी का ध्यान राधिकाजी के पल्लु पर लिखे घाव अर्थात् पंक्तियों पर जाता है उस समय ज्ञात होता है कि भगवान तो अन्र्तध्यान होकर वागड के साबला नामक गावं में श्री माव मनोहर मावजी महाराज नाम से अवतरित हो चुके है। नारायण अर्थात् (श्री कृष्णजी) ने तो वागड के साबला गावं में नया अवतार ले लिया है जो गोकुल, वृदांवन सा प्रतित होता है, जहां वेणवृंद्वावन (बैणेश्वर धाम) को बसाया है जहां भगवान बाल स्वरूप में गैया चराने जाते है एवं अपना सारा समय वही व्यतित करते है जहां सोम एवं माही जैसी पवित्र नदियों का संगम है तब नाराद जी श्री हरि से सभी को प्रभू से भेंट कराने वेणवृंद्वावन बैणेश्वर धाम के आबुदरा घाट पर पहुंचने के लिए गोकुल, वृंद्वावन से प्रस्थान करते है और रास्ते में सभी गोपियां विलाप करती हुई आगे बढती है ओर अपने मन भाव से करूण स्वर में नारदजी के समक्ष गीत गाती है और श्री हरि कृष्ण अंशावतारी माव मनोहर मावजी से मन ही मन गीत के माध्यम से अपने भावों को प्रकट करती है।

जो इस प्रकार है.............................

सामलिया जी राज प्रभुजी, अर्ज ओदारजु,

राखों अमारी लाज, केजु संन्देशो समजावी।

फाग खेले सर्वे सुन्दरी, पीयु आपणे संग.......2

हुरे वेरागण एकली, रमु कोने संगात । केजु........।

केशर कुम कुम अमरयो, कोने साटु अंग,

केशरियों घेरे नथी, केसो करीयों रंग । केजु.........।

वेह वेदन वेनता, बहु लागे सन्ताप,

व्याकुल हे मन माहेरा, वेला पधारों आप। केजु........।

अन्न तज्या सर्वे सुन्दरी, हुई हाल बेहाल।

सीर सज्या नी सुद नही, भुली सलगत साल।

                     केजु संन्देशो समजावी।।

इस प्रकार से विलाप गीत गाते हुए आबुदरा घाट पर पहुंचते है। आबुदरा घाट पर पहुंचते ही वहां सोम और माही नदी दोनो इतनी उफान पर जाती है कि उन बहती नदियों को पार करके साबला पहुंचना बडा कठिन व अंसभव सा हो गया था। तब सभी नारदजी से प्रार्थना करती है कि हमें प्रभु से जल्द से जल्द मिलना है ओर ये जो नदियां है वो हमें प्रभु माव मनोहर मावजी से मिलने में बाधक बन रही है। तब नारदजी कहते है कि है गोपियों श्री हरि मावजी महाराज के दर्षन करने है तो मन ही मन श्री माव मनोहर से प्रार्थना करों की, है प्रभु हम आपसे मिलना चाहते है कई वर्ष बीत चुके है, प्रभु दया करों ऐसा कहके अपनी दोनो आंखे बन्द करके दोनो हाथ जोड सभी पानी में उतर जाए ,जैसे ही सभी प्रार्थना करते है तब बहुत बडा चमत्कार होता है और सोम नदी प्रभु के आशिर्वाद से अपना रास्ता बदल कर आबुदरा घाट की तरफ अपना रूख बदल लेती है। और तीसरी नदी का उद्वगम होता है जिसे जाखम नाम से पहचाना जाने लगा। इसलिये बेणेष्वर धाम को त्रिवेणी संगम के नाम से पहचाना जाता है।

            जन श्रुति के आधार पर एवं आगमवाणी के अनुसार सभी गोपियों को श्री माव मनोहर मावजी से मिलने का रास्ता मिल जाता है

       

              (श्री सामरस अमृतसार -ग्रंथचित्र - 18 वीं शताब्दी)
(यह ग्रंथ आज भी नवलश्याम निवासी श्रीमान् शरदजी जोशी पिता     मोहनलालजी जोशी के पास सुरक्षित है।)

और जो रासलीला गोकुल, वृद्वांवन में अधुरी रह गई थी उस रासलीला को गोपियों के मीलन होने पर पुरा किया जाता है। द्वापरयुग से, कृष्ण अशांवतारी मावजी भी उस अधुरे रास का कई वर्षो से इंतजार कर रहे थे इस प्रकार प्रभू व भक्तों का मिलन होता है और अधुरी रासलीला पुरी को पुरा किया जाता है।  

                                   

                                 बेणेश्वर पर रास नृत्य

(श्री सामरस अमृतसार -ग्रंथचित्र - 18 वीं शताब्दी)

(यह ग्रंथ आज भी नवलश्याम निवासी श्रीमान् शरदजी जोशी पिता मोहनलालजी जोशी के पास सुरक्षित है।)

      जिस रासलीला की बात कि गई है वो आज भी मावजी के माव भक्त साद इस रासलीला को लगभग 297 वर्षो से मावजी महाराज के आर्शिवाद से पुरा करते हुए आ रहे है। इस प्रकार मावजी की आगमवाणी एवं अधुरी रासलीला को पुरे मन से पुरा किया जाता है।

      मैं उपेन्द्र सुरज साद मावजी महराज की इस आगमवाणी को जनश्रुति के अनुसार जितना जान पाया हुं, समझ पाया हुं आप तक पहुंचाने की पुरी कोशिश की है अगर कोई गलती हो तो क्षमा प्रार्थी हंु।
   


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माव मनोहर संत मावजी 

परिचयः- श्री माव मनोहर संत मावजी का जन्म राजस्थान राज्य के डंूगरपुर जिले के साबला कस्बे मंे संवत् 1771, लेकिन मावजी ने अपना जन्म स्वंय के द्वारा लिखी आगमवाणी की कुछ पंक्तियों में उल्लेखित किया है। संत मावजी की आगमवाणी के आधार पर मावजी का जन्म संवत् 1784 वार सोमवार को हुआ था। मावजी का जन्म निर्धन ब्राम्ह्ण के घर हुआ था जिनकेे पिता का नाम दालम ऋषि एवं माता का नाम केसर बा था। श्री मावजी बचपन से ही भगवान श्री कृष्ण की तरह लीलाएं करते थे जिससे गांव के लोग मावजी से प्रभावित हुए ओर लोगो के जुबान पर केवल एक ही नाम रहने लगा वो नाम था संत मावजी। संत मावजी का जन्म आगमवाणी की इन पंक्तियों से स्पष्ट होता है। ...........................................


ज्यारे दषमें नारायणजी नु निकंलकी नाम रे, क्षेत्र सबलापुरी पाटण गाम रे।

उत्तम न्यात रे माता केषर मात रे, ज्यारे पिता दालम ऋषि निकलंकीजी ने तात रे।

संवत सत्रहसो ने चैरासी नो साल रे, माघ रे मास मय उजलो पाख रे।

तेत एकादषी हरि ने वार सोमवार रे, षंुक्र लग्न में अमरत जोग रे।

मकर लग्न नो मल्यों संजोग रे, सहजे गुरू हरि ने सतिया सुर रे।

काया कल्प हरि ने मुखडे तम्बोल रे, ज्यारे हनुमंत भाव प्रगटो निज धाम रे।

त्यारे त्या धणीये धर्यों दषमों अवतार रे। 


माव मनोहर मावजी समुचे क्षेत्र मंे वैष्णव भक्ति धारा को प्रवाहित करने व हिन्दु संस्कृति के प्रचार-प्रसार का सुत्रपात बन गये। लोग मावजी को देवता स्वरूप मानने लगे थे, जनश्रुति के अनुसार मावजी स्वंय निष्कलंक अवतार के स्वरूप थे अतः संत मावजी प्रतिभा के धनी, भगवान श्री कृष्ण के अनन्य भक्त, साहित्य, कला, भविष्यवक्ता एवं ज्योतिष और खगोलविद् थे। संत मावजी ने अनेक भविष्यवाणीयां की थी जो वर्तमान में सत्य प्रतीत हो रही है। मावजी ने जो कुछ भी लिखा वह सब सत्य साबित हो रहा है। संत मावजी की भविष्यवाणियों को तत्कालिन षिष्य एवं समुदायों ने लिपिबद्व किया। एवं यही नहीं अनेक स्वरचित कृष्ण भक्ति के पद्म गोविन्द गीत, विभिन्न रागमालाओं में गाये जाने वाले कीर्तनों को भी लिपिबद्व किया। वही बेणेष्वरधाम संत मावजी के इन ग्र्रंथों की रचना व साधना का मुुख्य केन्द्र बना। आज बेणेष्वर वेण वृदांवन धाम के रूप में परम तीर्थ बन गया। बेणेष्वरधाम संत मावजी की तपोस्थली रही है। जहां सोम, माही एवं जाखम तीन नदियों का त्रिवेणी संगम है। जहां द्वापरयुग में राधिकाजी एवं सभी गोपियां के संग रास ख्ेालते हुए श्री कृष्ण अंतर्धान हो गये थे। इस कलयुग में भगवान श्री कृष्ण ने मावजी का अवतार लिया ओर राधिकाजी एवं गोपियों से मावजी का मिलन इन्ही त्रिवेणी संगम पर हुआ ओर अधुरे रास को सुनैया पर्वत पर पूरा किया। 

वागड क्षैत्र एवं वागड में निवासरत लोग भाग्यवान है जो भगवान मावजी के जन्मस्थल पर अपना जीवन यापन कर रहे है। 

संत मावजी ने कागज पर लाख की स्याही ओर बांस की कलम से 72 लाख 66 हजार भविष्यवाणियों को लिपिबद्व किया।

सोम, माही और जाखम इस पावन पुनीत संगम क्षेत्र पर श्री हरि मंदिर है। जिसे वागड क्षेत्र के प्रसिद्व माव मनोहर अर्थात् मावजी महाराज की पुत्र वधु जनकुंवरी ने सन् 1850 को बनवाया था। मावजी महाराज ने अपने महारास-पंथ की गद्दी इसी मठ मंे स्थापित की थी। इसी हरि मंदिर में संत मावजी द्वारा रचित महारास लीला ग्रंथ की सचित्र प्रतिलिपि सुरक्षित है। संत मावजी से संम्बधित ग्रंथों की पाडंूलिपिया पुंजपुर के मावजी मंदिर, बांसवाडा नगर में स्थित मंदिर तथा मेवाड के सलुंबर जिले से 5 किलोमीटर दुर षेषपुर ग्राम के हरि मंदिर में सुरक्षित है। अपने जीवन के अंतिम दिन संत मावजी ने इसी षेषपुर गाव मंे बिताएं थे। इसी षेषपुर गांव के तालाब की पाल पर उनका अंतिम संस्कार हुआ था। मावजी की समाधि स्थल पर भी भगवान निष्कंलक का मंदिर बनाया गया था। इसी गांव में संत मावजी महाराज से संबधित एक ओर हरि मंदिर का भी निर्माण किया गया है। 

इस सोम माही और जाखम के त्रिवेणी संगम पर प्रति वर्ष माघ पुर्णिमा को एक भव्य मेला लगता है। जिसे वागड का कुंभ कहते है जिसमें कई राज्य जैसे राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेष व विदेषी सेलानी भी इस भव्य मेले को देखने एवं वागड के परिवेष और संस्कृति को देखने के लिए भारी संख्या में स्वदेषी एवं विदेषी पर्यटक आते है, और ईष्वर की भक्ति की प्रेरणा प्राप्त करते है। आगमवाणी में संत मावजी (माव मनोहर) के जन्म को स्पष्ट किया गया है।

संत मावजी की काया यानी षरीर कोमल एवं मुख में मीठी वाणी थी। भगवान कृष्ण के अवतार स्वरूप मावजी महाराज ने चार विवाह किए थे, पहला विवाह मावजी ने स्वप्न में किया था, दुसरा विवाह डंूगरपुर जिले के गामडा ब्राह्मणिया नामक गांव के औदिच्य ब्राह्मण कि कन्या से किया, तीसरा विवाह सागवाडा नामक कस्बे में गुजराती पाटीदार की कन्या से किया था, एवं चैथा विवाह कूपडा, जिला बांसवाडा की औदिच्य ब्राम्हण की कन्या से किया था। संत मावजी को देव वाणी का प्रकाष मिला था, जिससे मावजी ने बहुत तपस्या की थी, मावजी महाराज के दो परम षिष्य थे जिनका नाम जीवनदास एवं केहरीदास था, कहां जाता है कि षिष्य जीवनदास की सहायता से 42 मन (मण) कागज मंगवाकर ग्रंथो की रचना की। मावजी महाराज ने लगभग 750 चैपडे (ग्रंथ) लिखे, जिसमें 5 मुख्य चैपडे थे, इन चैपडोें में पुरी आगमवाणी लिखी हुई है। आने वाले समय मंे क्या क्या होने वाला है, क्या क्या होगा, यह 5 चैपडे मुख्य है जो निम्न रूप में हैं।


जनश्रुति के अनुसार संत मावजी मावजी महाराज डंूगरपुर के सुरपुर ग्राम पंचायत के पास भीटवटा नाम के छोटे से गांव में गये वहां भगवान महादेव की स्वंय भू षिवलिंग की पुजा अर्चना कर धोणी की स्थापना की ओर वहीं पर तपस्या करना भी प्रारम्भं कियां। वही भिलवटा गावं में दो नदियों का संगम भी है। मावजी महाराज ने कई चमत्कार किये उन चमत्कारों के कारण डंूगरपुर के राजा के द्वारा मावजी महाराज को सेनिकों के माध्यम से महल के बंदीग्रह में बंदी बना लिया गया। लेकिन कुछ ही दिनों के पष्चात् पता चला की मावजी तो वहीं मंदिर में बैठ तपस्या कर रहे है। इस जानकारी के पश्चात् राजा स्वंय मावजी महाराज बंदीग्रह में देखने गये लेकिन राजा को मावजी कई नजर नहीं आए। लेकिन जो भी व्यक्ति मंदिर में जाता तो मावजी मंदिर में तपस्या करते नजर आते, राजा के प्रहरियांे को मावजी बंदीग्रह में नजर आते इस प्रकार की चर्चा होती सुनकर राजा पूनः सेनिको को भीलवटा गांव भेजते है ओर मावजी महाराज को पूनः बंदी बना कर सैनिको के माध्यम से डंूगरपुर के गेपसागर की पाल पर लाया जाता है फिर राजा के द्वारा यह षर्त रखी जाती है कि आप इतने की चमत्कारीक है तो इस गेपसागर के पानी पर चल के बता दो। राजा के द्वारा इस तरह की बाते बार बार कह कर मावजी महाराज को अपनानित किया जा रहा था। ग्रंथो के आधार पर ऐसा माना जाता है कि भगवान राम हनुमान जी को त्रेतायुग में एक वचन दे कर गये थे कि कलयुग तक तुम्हे पृथ्वी पर जीवित रहना है। हनुमानजी का मंदिर गेपसागर के पाल पर ही बना हुआ है। हनुमानजी की उपस्थिति में मावजी महाराज का राजा के द्वारा अपमान किया जा रहा था यह उचित नहीं था लेकिन उस अपमान को हनुमान जी देख रहे थे मावजी महाराज भगवान विष्णु के ही अवतार है ओर हनुमानजी भगवान राम के द्वारा दिये गये वचन को भूल गये थे एंव हनुमानजी मावजी को पहचान नहीं पाये थे तब अपमान से भरे हुए मावजी ने हनुमानजी को थप्पड मारा था इसलिए जनश्रुति के अनुसार हनुमानजी का मुख दक्षिण दिषा से उत्तर दिषा की तरफ हो गया। विष्व में एकमात्र ऐसा मंदिर है जिसमें हनुमानजी का मुख उत्तर दिषा की ओर है, जो डूंगरपरु के गेपसागर की पाल पर स्थित है। इसके पष्चात् मावजी महाराज राजा के अपमान जनक बातों को सुनकर गेपसागर की पाल पर अपनी दोनों पादुकाएं उतार देते है ओर राजा को कहते है कि में तो पानी पर चल दुंगा लेकिन मेरे जाने के बाद 5 वर्षो तक इस गेपसागर में गधे चरेगंे अर्थात अकाल पडने जैसी भविष्यवाणी मावजी महाराज ने की। ओर इस प्रकार की भविष्यवाणी कर मावजी महाराज गेपसागर के पानी पर चल के सलुम्बर जिले के षेषपुर गांव में धोलागढ पर्वत पर जा कर बस गये ओर वहीं पर रहकर मावजी ने भविष्य वाणियां लिखी। एवं मावजी महाराज ने अपने दो परम् षिष्य जिवनदास एवं केहरीदास के द्वारा षेषपुर गांव से 42 मण कागज मंगवाये एवं षेषपुर वासियों द्वारा बेलगाडी में भरकर कागज को धोलागढ पर पहुंचाया गया। इसके पश्चात् मावजी महाराज ने उन 42 मण कागज से कुल 750 गुटके एवं 5 मुख्य बडे चोपडे लिखें जिसमें क्या हुआ है एवं क्या-क्या होने वाला इस तरह से कुल 72 लाख 66 हजार भविष्यवाणी को लिखा। उन 5 चैपडों की साईज 4 गुणा 2 है जो एक व्यक्ति के द्वारा न तो उठाया जा सकता है ना ही पन्ने को पलटा जा सकता है। इस प्रकार से इन चैपडों के माध्यम से भविष्यवाणीयां की, जो आज हम सभी इन से परिचित है। 

यह भविष्यवाणियां इस प्रकार है जो आप पाठक पढ कर अंचभित हो जायेगें। मावजी ने जो भविष्यवाणी की है वह वर्तमान में सभी सत्य हो रही है। जिसमें कई तो हमारे सामने साबित हो चुकी है ओर कुछ भविष्यवाणियों के सत्य साबित होने में अभी समय है। 

जे इस प्रकार हैं।

संत मावजी द्वारा लिखित मुख्य पांच चैपडे (ग्रंथ)

1. साम सागरः-  यह भगवान मावजी महाराज के द्वारा लिखे गये  चैपडों मंे सबसे पहला ग्रंथ है जो भारत के राजस्थान राज्य के मेवाड क्षेत्र के षेषपुर गांव में आज भी सुरक्षित है जिसे वागडी में हेपोर कहां जाता है। इस चैपडें (गं्रथ) में मेवाड के षेषपुर गांव में स्थित धोलागढ पर्वत का वर्णन है जिसमें दिव्य वाणी का ज्ञान है। जनश्रुति के अनुसार मावजी महाराज ने अपनी तपस्या के लिए धोलागढ पर्वत पर श्री हरि मंदिर, षिव मंदिर एवं ब्रम्हांजी के मंदिर का निर्माण करवाया और पर्वत की गुफाओं में रहकर सभी गं्रथों को लिखा। जिस तरह धोलागढ पर्वत पर मंदिर सुषोभित है उसी तर्ज पर बेणेष्वरधाम पर मंदिर स्थित है। यह धोलागढ पर्वत हमेषा से बादलों से घेरा रहता है। 

2. प्रेम सागरः- यह भगवान मावजी महाराज के द्वारा लिखे गये चैपडों मंे सबसे दुसरा ग्रंथ है जो डंूगरपुर के  पंुजपुर गांव में सुरक्षित है। जिसे भगवान मावजी ने धर्मोपदेष, भूगोल इतिहास ओर भावी घटनाआंे    की प्रतिकात्मक जानकारी दी है। मावजी महाराज ने धर्म की बाते लिखी है जमीन आसमान नो परदो टुटसी। मावजी महाराज ने ओजोन परत की ओर इंगित किया है। 

3. मेघ सागरः- यह भगवान मावजी महाराज के द्वारा लिखे गये चैपडों मंे सबसे तीसरा ग्रंथ है जो डंूगरपुर के  साबला गांव में श्री हरि मंदिर में सुरक्षित है। इस ग्रंथ में मावजी ने गीता उपदेष एवं भौगोलिक परिवर्तनों के साथ कई भविष्यवाणियां लिखी है। 

4. रतन सागर: यह भगवान मावजी महाराज के द्वारा लिखे गये चैपडों मंे सबसे चैथा ग्रंथ है   जो बांसवाडा जिले के त्रिपोलियां रोड स्थित विष्वकर्मा मंदिर में सुरक्षित है। इस ग्रंथ में मावजी महाराज द्वारा रंगीन चित्र, रासलीला एवं कृष्णलीलाओं का मनोहारी वर्णन किया है। 

5. अनन्त सागरः- यह भगवान मावजी महाराज के द्वारा लिखे गये चैपडों मंे पांचवा ग्रंथ है जो मराठा आक्रमण के समय बाजीराव पेषवा साबला, बेणेष्वर से गुजरते हुए अपने साथ ले जा रहे थे लेकिन जब अंग्रेजो  को पता चला की मावजी नामक एक संत हुए थे उनके द्वारा कई चमत्कारिक ग्रथं लिखे गये है     उसमें अनन्त सागर जिसमें ज्ञान-विज्ञान की समस्त आविष्कारिक योजनाआंे के बारे में लिखा है            इस बात की जानकारी होते ही अग्रेंज मराठाआंे को पराजित करके के ले गये। माना जाता है कि अनन्त सागर लंदन के किसी म्युजियम मंे आज भी सुरक्षित है। इसलिये जितने भी अविष्कार होते हुए आ रहे है वह सभी विदेषी वैज्ञानिकों के द्वारा किए गए जो हमारे सभी के संज्ञान में है।

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1 comment:

  1. उपेन्द्र जी द्वारा बहुत ही सराहनीय प्रयास किया गया हैl

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