Wednesday, January 29, 2025

लीलावतारी श्री माव मनोहर संत मावजी की आगमवाणी एवं रासलीला

 

लीलावतारी

श्री माव मनोहर संत मावजी की

आगमवाणी एवं रासलीला

आगमवाणी- लीलावतारी मावजी महाराज की आगमवाणी का गान एवं श्री कृष्ण की द्वापरयुग में अधुरी रही रासलीला का वर्णन कुछ इस प्रकार से किया गया है। जो आप पाठकों के समक्ष साधारण शब्दों में परोसा जा रहा है।

      सर्वप्रथम तो आगमवाणी है क्या, इसके बारे में हमें जानना बहुत आवश्यक है। आगमवाणी में श्री माव मनोहर मावजी ने आगम का आशय - आने वाली एवं होने वाली, वाणी का आशय - बाते अर्थात् चमत्कार, भविष्य में होने वाली बाते अर्थात् चमत्कार जो आगे होने वाले है, मतबल यह है कि माव मनोहर ने अपने शास्त्रों में यह तक लिख दिया था। कि आगे जीवन मंे अर्थात् आने वाले समय में क्या क्या होगा। समय और वस्तुओं में कैसा कैसा परिवर्तन होगा। क्या क्या घटनाएं एवं परिघटनाएं होगी, कैसे कैसे लोग होगें, जो संत बनकर स्वंय को भगवान समझेगें, लोग स्वंय से ज्यादा उन ढोगीं व्यक्तियों के उपर भरोसा करेगें, उनको ही भगवान समझगें, उन्होने जो कहां वह पत्थर की लकीर मानी जाएगी। इस माव वाणी अर्थात् आगमवाणी के आधार पर आप सभी आज के इस कलयुग मंे देख ही रहे है। हमारे सामने कैसे कैसे ढोंगी पुरूष है, जो हवालात अर्थात् जैल की हवा खा रहे है। माव मनोहर श्री मावजी स्वंय ईश्वर है और इन्हे पहले से ही ज्ञात था कि आगे ऐसे कार्य होगें जो हमनेे सोचा नहीं होगा। आज के इस युग में पिता बेटे का नहीं, बेटा माता पिता का नहीं, भाई-भाई का नहीं, ऐसे ऐसे कृत्य हमारे सामने होगें कि व्यक्ति स्वंय अचंभित रह जाएगा। आगमवाणी का आशय ही यही है कि आगे क्या होगा अर्थात् क्या क्या होने वाला है।

संत मावजी ने अपनी माववाणी अर्थात् आगमवाणी मंे यह भी बताया है कि ऐसा घोर कलयुग आएगा, की माता-पिता अपने पुत्री को दुनिया में आने से पहले ही कोख में मार देगें जो हम सभी आज के इस घौर कलयुग में देख भी रहे है, एक बेटा अपने पिता की दिन दहाडंे जरा सा टोकने एवं कुछ कहने पर अपराध कर बेढता है। संत मावजी ने जो भविष्यवाणीयां की वो आज हम लोग मीडिया के माध्यम से देख रहे है। क्या हम सभी ने कभी सोचा था, लेकिन संत मावजी महाराज ने पहले से ही इन सभी बातों को अपने हाथों से लिखे हुए  माव शास्त्र में लिख दिया एवं मावजी महाराज के द्वारा जो भविष्यवाणीयां की गई वो आज हम सभी के सामने है जिसे हम भली भांति जानते है।   

जनश्रुती के अनुसार एवं आगमवाणी के आधार पर इस बात को स्वीकार किया गया है कि  मावजी महाराज भगवान श्री कृष्ण के अशांवतारी माने जाते है। मावजी की सारी लीलाएं श्री कृष्ण की भांती ही थी, जो साबला एवं बैणेश्वर धाम में पुरी की गई थी। जनश्रुति के अनुसार अर्थात् आगमवाणी एवं शास्त्रों के आधार पर भगवान श्री कृष्ण द्वापर युग में अपने सम्पूर्ण कार्य को पुरा करने के बाद जब राधिका एवं गोपियों के संग रास खेल रह थे उस रासलीला को खेलते समय राधिका के पालव यानी पल्लु पर एक घाव लिखा अर्थात् कुछ पंक्तिया लिखी जो इस प्रकार थी। यहां घाव का आषय पंक्तियों से है। कुछ पंक्तियां लिखी है जो इस प्रकार है।

बेणेश्वर से बैणकों,

सोम माही को घाट,

आबुदरों छे आद नो,

   त्या जो जो मारी वाट ।।

राधाजी के पालव यानी साडी के पल्लु पर जिन पंक्तियों को लिखा गया है, इससे यह स्पष्ट होता है कि वागड की धरती पर बैणेश्वर धाम है, बैणेश्वरधाम पर सोम और माही नदीयांें का संगम है, वही आबुदरा घाट हैं इस आबुदरा के घाट पर आकर मेरा इंतजार करना मैं वही पर मिलुंगा। भगवान श्री कृष्ण ने गोकुल के सभी ग्वाले मित्र, सभी गोपिया, राधिकाजी एवं नारदजी को इन पंक्तियों के माध्यम से संबोधित करते हुए कहां है। इन पंक्तियों को लिखने के बाद रास खलते हुए भगवान श्री कृष्ण अचानक से अन्र्तधान हो गये थे। इस प्रकार द्वापरयुग से राधिकाजी, सोलह हजार सोलह सौ गोपिया, गोकुल, वृंदावन के ग्वाले, वहां की गौ एवं अन्य सभी कई समय से श्री कृष्ण को देख नहीं पाये थे, तब सभी चिन्तन करने को मजबुर हो गये थे। आखिर श्री हरि गये तो कहंा गये, तब सारी गोपियां विलाप (दुःखी मन) करती है और अपनी करूण स्वर में गीत गाती हैै। और भाव प्रकट करती है कि.......................





     अने अरे साम्मरीयाजी कहां गया रे,


        अमणे आय हता रे निरवाण।


        अने अरेक अमणे आय हता रे,


        पल में अलप थया रे निरवाण।


        अने अरेक कुदम (कदम्ब) ना जाड ने,


        सखीयों पुसण लागी वात।


        अने जणी वाटे मारो वालो गयो रे,


         तेणी वाटे कंकव ना पगला।


        अने अरेक आबुदरे जइये रे,


        सखीयों भक्ति करीये ने अपार।


अर्थः- भगवान श्री कृष्ण को मिलने के लिए सखियां विलाप करती है अर्थात् दुःखी मन से कहती है कि सखियां श्री हरि को मिलने एवं दर्शन करने के लिए इतनी अति विचलित हो जाती है कि सभी गोपिया मन ही मन श्री माव मनोहर मावजी महाराज से यह कह रही है, कि हे भगवन आप कहां चले गये, सभी गोपिया रस्ते में आये हर कदम्ब के वृक्ष पर देखती है कि भगवान कही कदम्ब के वृक्ष पर तो नहीं बेढे है, गोपियां एक दुसरे से आपस में कहती है कि जरा जमीन पर झुक कर भी देखना कहीं भगवान के पैरो की छाप तो नहीं पडी है, आखिरकार भगवान इसी रास्ते से गये होगें तो कुम कुम के निशान होगें। फिर से गोपियां आपस में बाते करती है ओर इस प्रकार से सभी अपने मन के भाव को श्री हरि तक पंहुचाने का प्रयास करती है।
इस गीत को पुरा करने के बाद सभी अंत में सभी नारदजी के पास पहुंचते है और नारदजी को सारी व्यथा बताते है तब नारद जी का ध्यान राधिकाजी के पल्लु पर लिखे घाव अर्थात् पंक्तियों पर जाता है उस समय ज्ञात होता है कि भगवान तो अन्र्तध्यान होकर वागड के साबला नामक गावं में श्री माव मनोहर मावजी महाराज नाम से अवतरित हो चुके है। नारायण अर्थात् (श्री कृष्णजी) ने तो वागड के साबला गावं में नया अवतार ले लिया है जो गोकुल, वृदांवन सा प्रतित होता है, जहां वेणवृंद्वावन (बैणेश्वर धाम) को बसाया है जहां भगवान बाल स्वरूप में गैया चराने जाते है एवं अपना सारा समय वही व्यतित करते है जहां सोम एवं माही जैसी पवित्र नदियों का संगम है तब नाराद जी श्री हरि से सभी को प्रभू से भेंट कराने वेणवृंद्वावन बैणेश्वर धाम के आबुदरा घाट पर पहुंचने के लिए गोकुल, वृंद्वावन से प्रस्थान करते है और रास्ते में सभी गोपियां विलाप करती हुई आगे बढती है ओर अपने मन भाव से करूण स्वर में नारदजी के समक्ष गीत गाती है और श्री हरि कृष्ण अंशावतारी माव मनोहर मावजी से मन ही मन गीत के माध्यम से अपने भावों को प्रकट करती है।


जो इस प्रकार है.............................

                                                सामलिया जी राज प्रभुजी, अर्ज ओदारजु,

राखों अमारी लाज, केजु संन्देशो समजावी।

फाग खेले सर्वे सुन्दरी, पीयु आपणे संग.......2

हुरे वेरागण एकली, रमु कोने संगात । केजु........।

केशर कुम कुम अमरयो, कोने साटु अंग,

केशरियों घेरे नथी, केसो करीयों रंग । केजु.........।

वेह वेदन वेनता, बहु लागे सन्ताप,

व्याकुल हे मन माहेरा, वेला पधारों आप। केजु........।

अन्न तज्या सर्वे सुन्दरी, हुई हाल बेहाल।

सीर सज्या नी सुद नही, भुली सलगत साल।

    केजु संन्देशो समजावी।।

इस प्रकार से विलाप गीत गाते हुए आबुदरा घाट पर पहुंचते है। आबुदरा घाट पर पहुंचते ही वहां सोम और माही नदी दोनो इतनी उफान पर जाती है कि उन बहती नदियों को पार करके साबला पहुंचना बडा कठिन व अंसभव सा हो गया था। तब सभी नारदजी से प्रार्थना करती है कि हमें प्रभु से जल्द से जल्द मिलना है ओर ये जो नदियां है वो हमें प्रभु माव मनोहर मावजी से मिलने में बाधक बन रही है। तब नारदजी कहते है कि है गोपियों श्री हरि मावजी महाराज के दर्षन करने है तो मन ही मन श्री माव मनोहर से प्रार्थना करों की, है प्रभु हम आपसे मिलना चाहते है कई वर्ष बीत चुके है, प्रभु दया करों ऐसा कहके अपनी दोनो आंखे बन्द करके दोनो हाथ जोड सभी पानी में उतर जाए ,जैसे ही सभी प्रार्थना करते है तब बहुत बडा चमत्कार होता है और सोम नदी प्रभु के आशिर्वाद से अपना रास्ता बदल कर आबुदरा घाट की तरफ अपना रूख बदल लेती है। और तीसरी नदी का उद्वगम होता है जिसे जाखम नाम से पहचाना जाने लगा। इसलिये बेणेष्वर धाम को त्रिवेणी संगम के नाम से पहचाना जाता है।


            जन श्रुति के आधार पर एवं आगमवाणी के अनुसार सभी गोपियों को श्री माव मनोहर मावजी से मिलने का रास्ता मिल जाता है

       

(श्री सामरस अमृतसार -ग्रंथचित्र - 18 वीं शताब्दी)

(यह ग्रंथ आज भी नवलश्याम निवासी श्रीमान् शरदजी जोशी पिता मोहनलालजी जोशी के पास सुरक्षित है।)

और जो रासलीला गोकुल, वृद्वांवन में अधुरी रह गई थी उस रासलीला को गोपियों के मीलन होने पर पुरा किया जाता है। द्वापरयुग से, कृष्ण अशांवतारी मावजी भी उस अधुरे रास का कई वर्षो से इंतजार कर रहे थे इस प्रकार प्रभू व भक्तों का मिलन होता है और अधुरी रासलीला पुरी को पुरा किया जाता है।  

                       

बेणेश्वर पर रास नृत्य

(श्री सामरस अमृतसार -ग्रंथचित्र - 18 वीं शताब्दी)

(यह ग्रंथ आज भी नवलश्याम निवासी श्रीमान् शरदजी जोशी पिता मोहनलालजी जोशी के पास सुरक्षित है।)

      जिस रासलीला की बात कि गई है वो आज भी मावजी के माव भक्त साद इस रासलीला को लगभग 297 वर्षो से मावजी महाराज के आर्शिवाद से पुरा करते हुए आ रहे है। इस प्रकार मावजी की आगमवाणी एवं अधुरी रासलीला को पुरे मन से पुरा किया जाता है।


      मैं उपेन्द्र सुरज साद मावजी महराज की इस आगमवाणी को जनश्रुति के अनुसार जितना जान पाया हुं, समझ पाया हुं आप तक पहुंचाने की पुरी कोशिश की है अगर कोई गलती हो तो क्षमा प्रार्थी हंु।


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