राजस्थान की पहली पुस्तक
NCTE के पाठ्यक्रमानुसार
दो वर्षीय बी.एड एवं चार वर्षीय बी.ए -बी.एड / बी.एस.सी -बी.एड
MLSU एवं GGTU के विद्यार्थियों के लिए अति आवश्यक
प्रस्तुत पुस्तक देश के कई ज्ञाताओ द्वारा लिखी गई मनोविज्ञान की पुस्तकों को पढ़कर अधिगम एवं शिक्षण पुस्तक को बड़ी मेहनत एवं लगन से तेयार किया गया हे |आप सभी विद्यार्थियों के लिए बहुत ही लाभदायक है|
अगर आप प्रतियोगी परीक्षा REET (L 1 - L2) , III ग्रेड, II ग्रेड की तेयारी कर रहे हे तो भी आप सभी के लिए बड़ी महत्वपूर्ण हें| आप मेरी इस पुस्तक को अवश्य ख़रीदे|
शिक्षण एवं अधिगम
शिक्षण एवं अधिगम एक द्विध्रुवीय प्रक्रिया है, जिससे सीखने वाले एवं सिखाने वाले दोनों ही पक्षों की समान महत्ता है अर्थात् अध्यापक एवं छात्र दोनों ही इस प्रक्रिया के समान आधार है। किसी एक पक्ष के सहयोग के अभाव में सीखने-सीखाने की प्रक्रिया बाधित हो सकती है। इसलिए यह आवष्यक है कि अध्यापक न केवल अपने स्वंय के विषय में ही जाने बल्कि सीखने वाले बालक को भी समझने का पूरा प्रयास करें। अतः षिक्षक यह जानने कि पूरी कोषिष करें की बालक (छात्र) की मनो-षारीरिक अवस्था कैसी है, बालक किस समस्या से ग्रस्त है एवं उस छात्र का सम्बन्ध किस प्रकार के वातावरण से है। तभी षिक्षक उस छात्र के अधिगम हेतु उपयोगी व्यूह रचना बनाने में समर्थ हो सकता है एवं इसी के आधार पर निर्धारित लक्ष्य प्राप्त होना सम्भव हो सकता है। विगत कुछ वर्षो से अधिगम के प्रति लोगांे के दृष्टीकोण में काफि परिवर्तन हुए है। अधिगम कक्षा-कक्ष के भीतर सम्पन्न होने वाली घटना नहीं बल्कि यह कही भी, कभी भी, किसी के द्वारा भी सम्पन्न होने वाली घटना है।
प्रस्तुत पुस्तक षिक्षण एवं अधिगम में एक अधिगम निरतंर चलने वाली सार्वभौमिक प्रक्रिया है। व्यक्ति जन्म से ही सीखना प्रारम्भ कर देता है तथा मृत्यु पर्यन्त कुछ ना कुछ सीखता रहता है एवं सीखने की गति परिस्थिति के अनुरूप घटती-बढती रहती है अर्थात् सीखने के लिए कोई स्थान विषेष नहीं होता है व्यक्ति कहीं भी, कभी भी, किसे से कुछ भी सीख सकता है। इसलिये सीखने को अधिगम कहते है।
इस पुस्तक को पाठ्यक्रमानुसार निम्नलिखित पांच इकाइयों में बांटा गया है।
1. अधिगम की अवधारणा और प्रकृति (स्वरूप)
2. अधिगम के घटकों को समझना।
3. षिक्षण अधिगम की प्रक्रिया को समझना।
4. पेषे के रूप में षिक्षक और षिक्षण।
5. एक जटिल गतिविधि के रूप में षिक्षण।
इस प्रकार एक विषिष्ट बालक की षिक्षा से सम्बन्धित विविध पक्षोें को भी कुषलतापूर्वक उभारकर षिक्षक को इस योग्य बनाने का प्रयास किया गया है। कि विषेष प्रकार के छात्रों को सिखाने में समर्थ हो सके। निःसन्देह यह पुस्तक षिक्षा महाविद्यालयों के प्रषिक्षणार्थियों एवं सेवारत अध्यापकों के लिए उपयोगी एवं सिद्व होगी।
प्रस्तुत पुस्तक का यह संस्करण राजस्थान के सभी विष्वविद्यालय में संचालित बी.ए-बी.एड एवं बी.ए.सी-बी.एड महाविद्यालयों के अध्ययनरत विद्यार्थियों के लिए उपयोगी है। तकनीकी शब्दों एवं विद्वानों के विचारों को अधिक स्पष्ट करने हेतु आवष्यकतानुसार अंग्रेजी भाषा का उपयोग किया गया है। अनावष्वक सामग्री को पुस्तक मे ंन रखकर तथा वाद विवाद में न पडते हुए पुस्तक को उपयोगी एवं आवष्यक बनाने का हर सम्भव प्रयास किया गया है।
पुस्तक की रचना में अनेक विद्वानांे के द्वारा रचित ग्रंथों से सहायता ली गई है। पुस्तक का वर्तमान स्वरूप अनेक विद्वानों की बहुमूल्य कृतियों और विचारों पर आधारित हैं। मैं उपेन्द्र सूरज साद इन सभी विद्वानांे और अनुसन्धानकर्ताओं के प्रति ह्दय से कृतज्ञ हूं। बहुत सतर्कता के बाद भी पुस्तक में त्रुटियां रह सकती है। आषा है षिक्षक बन्धु एवं पाठकगण क्षमा करें तथा अपने बहुमूल्य सुझावों से अवगत कराने की कृपा करें।
माव मनोहर भगवान मावजी महाराज की कृपा एवं आषीर्वाद से मैं उपेन्द्र सूरज साद अधिगम एवं षिक्षण से सम्बन्धित सम्पूर्ण जानकारी को इस पुस्तक मंें उतारने की कोषिष कर रहा हंू। मैं अपने गुरू गोस्वामी महंत अच्युतानन्दजी महाराज को सादर नमन करता हूं। तत्पष्चात् करूणा के सागर भगवान मावजी चैतन्य महाप्रभु को प्रणाम करता हंू। मेरे गुरू एवं मेरे माता पिता के आषीर्वाद से ही मुझे इस बी.एड की पुस्तक कि रचना करने का मौका मिला। परम पूज्य गुरूवर एवं पूज्य माता श्रीमती सीता देवी एवं पिता सूरजमल साद के आषीर्वाद से एवं धर्म पत्नी मनीषा साद के सहयोग व गुरूकुल संस्थान के निदेषक षरद जोषी के आषीर्वाद व दिषा डिग्री काॅलेज की प्राचार्य डाॅ. प्रियंका चैबीसा एवं डाॅ. सुबोधकांत नायक, लोकेष षर्मा, कैलाष सोमपुरा एवं सभी मेरे साथी स्टाफ के सहयोग से इस सुन्दर एवं विषाल कार्य को करने की क्षमता रखता हूॅ। मैं सदैव इन सभी का आभारी रहूंगा एवं मैं अपने माता पिता एवं मेरे सहयोगी साथियों को भी प्रमाण करता हंू कि मुझे षिक्षण प्रषिक्षण पुस्तक की रचना करने की प्रेरणा दी।
उपेन्द्र सूरज साद
गुरूकुल पी.जी. काॅलेज,
डंूगरपुर (राज.)
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