माव मनोहर संत मावजी
परिचयः- श्री माव मनोहर संत मावजी का जन्म राजस्थान राज्य के डंूगरपुर जिले के साबला कस्बे मंे संवत् 1771, लेकिन मावजी ने अपना जन्म स्वंय के द्वारा लिखी आगमवाणी की कुछ पंक्तियों में उल्लेखित किया है। संत मावजी की आगमवाणी के आधार पर मावजी का जन्म संवत् 1784 वार सोमवार को हुआ था। मावजी का जन्म निर्धन ब्राम्ह्ण के घर हुआ था जिनकेे पिता का नाम दालम ऋषि एवं माता का नाम केसर बा था। श्री मावजी बचपन से ही भगवान श्री कृष्ण की तरह लीलाएं करते थे जिससे गांव के लोग मावजी से प्रभावित हुए ओर लोगो के जुबान पर केवल एक ही नाम रहने लगा वो नाम था संत मावजी। संत मावजी का जन्म आगमवाणी की इन पंक्तियों से स्पष्ट होता है। ...........................................
ज्यारे दषमें नारायणजी नु निकंलकी नाम रे, क्षेत्र सबलापुरी पाटण गाम रे।
उत्तम न्यात रे माता केषर मात रे, ज्यारे पिता दालम ऋषि निकलंकीजी ने तात रे।
संवत सत्रहसो ने चैरासी नो साल रे, माघ रे मास मय उजलो पाख रे।
तेत एकादषी हरि ने वार सोमवार रे, षंुक्र लग्न में अमरत जोग रे।
मकर लग्न नो मल्यों संजोग रे, सहजे गुरू हरि ने सतिया सुर रे।
काया कल्प हरि ने मुखडे तम्बोल रे, ज्यारे हनुमंत भाव प्रगटो निज धाम रे।
त्यारे त्या धणीये धर्यों दषमों अवतार रे।
माव मनोहर मावजी समुचे क्षेत्र मंे वैष्णव भक्ति धारा को प्रवाहित करने व हिन्दु संस्कृति के प्रचार-प्रसार का सुत्रपात बन गये। लोग मावजी को देवता स्वरूप मानने लगे थे, जनश्रुति के अनुसार मावजी स्वंय निष्कलंक अवतार के स्वरूप थे अतः संत मावजी प्रतिभा के धनी, भगवान श्री कृष्ण के अनन्य भक्त, साहित्य, कला, भविष्यवक्ता एवं ज्योतिष और खगोलविद् थे। संत मावजी ने अनेक भविष्यवाणीयां की थी जो वर्तमान में सत्य प्रतीत हो रही है। मावजी ने जो कुछ भी लिखा वह सब सत्य साबित हो रहा है। संत मावजी की भविष्यवाणियों को तत्कालिन षिष्य एवं समुदायों ने लिपिबद्व किया। एवं यही नहीं अनेक स्वरचित कृष्ण भक्ति के पद्म गोविन्द गीत, विभिन्न रागमालाओं में गाये जाने वाले कीर्तनों को भी लिपिबद्व किया। वही बेणेष्वरधाम संत मावजी के इन ग्र्रंथों की रचना व साधना का मुुख्य केन्द्र बना। आज बेणेष्वर वेण वृदांवन धाम के रूप में परम तीर्थ बन गया। बेणेष्वरधाम संत मावजी की तपोस्थली रही है। जहां सोम, माही एवं जाखम तीन नदियों का त्रिवेणी संगम है। जहां द्वापरयुग में राधिकाजी एवं सभी गोपियां के संग रास ख्ेालते हुए श्री कृष्ण अंतर्धान हो गये थे। इस कलयुग में भगवान श्री कृष्ण ने मावजी का अवतार लिया ओर राधिकाजी एवं गोपियों से मावजी का मिलन इन्ही त्रिवेणी संगम पर हुआ ओर अधुरे रास को सुनैया पर्वत पर पूरा किया।
वागड क्षैत्र एवं वागड में निवासरत लोग भाग्यवान है जो भगवान मावजी के जन्मस्थल पर अपना जीवन यापन कर रहे है।
संत मावजी ने कागज पर लाख की स्याही ओर बांस की कलम से 72 लाख 66 हजार भविष्यवाणियों को लिपिबद्व किया।
सोम, माही और जाखम इस पावन पुनीत संगम क्षेत्र पर श्री हरि मंदिर है। जिसे वागड क्षेत्र के प्रसिद्व माव मनोहर अर्थात् मावजी महाराज की पुत्र वधु जनकुंवरी ने सन् 1850 को बनवाया था। मावजी महाराज ने अपने महारास-पंथ की गद्दी इसी मठ मंे स्थापित की थी। इसी हरि मंदिर में संत मावजी द्वारा रचित महारास लीला ग्रंथ की सचित्र प्रतिलिपि सुरक्षित है। संत मावजी से संम्बधित ग्रंथों की पाडंूलिपिया पुंजपुर के मावजी मंदिर, बांसवाडा नगर में स्थित मंदिर तथा मेवाड के सलुंबर जिले से 5 किलोमीटर दुर षेषपुर ग्राम के हरि मंदिर में सुरक्षित है। अपने जीवन के अंतिम दिन संत मावजी ने इसी षेषपुर गाव मंे बिताएं थे। इसी षेषपुर गांव के तालाब की पाल पर उनका अंतिम संस्कार हुआ था। मावजी की समाधि स्थल पर भी भगवान निष्कंलक का मंदिर बनाया गया था। इसी गांव में संत मावजी महाराज से संबधित एक ओर हरि मंदिर का भी निर्माण किया गया है।
इस सोम माही और जाखम के त्रिवेणी संगम पर प्रति वर्ष माघ पुर्णिमा को एक भव्य मेला लगता है। जिसे वागड का कुंभ कहते है जिसमें कई राज्य जैसे राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेष व विदेषी सेलानी भी इस भव्य मेले को देखने एवं वागड के परिवेष और संस्कृति को देखने के लिए भारी संख्या में स्वदेषी एवं विदेषी पर्यटक आते है, और ईष्वर की भक्ति की प्रेरणा प्राप्त करते है। आगमवाणी में संत मावजी (माव मनोहर) के जन्म को स्पष्ट किया गया है।
संत मावजी की काया यानी षरीर कोमल एवं मुख में मीठी वाणी थी। भगवान कृष्ण के अवतार स्वरूप मावजी महाराज ने चार विवाह किए थे, पहला विवाह मावजी ने स्वप्न में किया था, दुसरा विवाह डंूगरपुर जिले के गामडा ब्राह्मणिया नामक गांव के औदिच्य ब्राह्मण कि कन्या से किया, तीसरा विवाह सागवाडा नामक कस्बे में गुजराती पाटीदार की कन्या से किया था, एवं चैथा विवाह कूपडा, जिला बांसवाडा की औदिच्य ब्राम्हण की कन्या से किया था। संत मावजी को देव वाणी का प्रकाष मिला था, जिससे मावजी ने बहुत तपस्या की थी, मावजी महाराज के दो परम षिष्य थे जिनका नाम जीवनदास एवं केहरीदास था, कहां जाता है कि षिष्य जीवनदास की सहायता से 42 मन (मण) कागज मंगवाकर ग्रंथो की रचना की। मावजी महाराज ने लगभग 750 चैपडे (ग्रंथ) लिखे, जिसमें 5 मुख्य चैपडे थे, इन चैपडोें में पुरी आगमवाणी लिखी हुई है। आने वाले समय मंे क्या क्या होने वाला है, क्या क्या होगा, यह 5 चैपडे मुख्य है जो निम्न रूप में हैं।
जनश्रुति के अनुसार संत मावजी मावजी महाराज डंूगरपुर के सुरपुर ग्राम पंचायत के पास भीटवटा नाम के छोटे से गांव में गये वहां भगवान महादेव की स्वंय भू षिवलिंग की पुजा अर्चना कर धोणी की स्थापना की ओर वहीं पर तपस्या करना भी प्रारम्भं कियां। वही भिलवटा गावं में दो नदियों का संगम भी है। मावजी महाराज ने कई चमत्कार किये उन चमत्कारों के कारण डंूगरपुर के राजा के द्वारा मावजी महाराज को सेनिकों के माध्यम से महल के बंदीग्रह में बंदी बना लिया गया। लेकिन कुछ ही दिनों के पष्चात् पता चला की मावजी तो वहीं मंदिर में बैठ तपस्या कर रहे है। इस जानकारी के पश्चात् राजा स्वंय मावजी महाराज बंदीग्रह में देखने गये लेकिन राजा को मावजी कई नजर नहीं आए। लेकिन जो भी व्यक्ति मंदिर में जाता तो मावजी मंदिर में तपस्या करते नजर आते, राजा के प्रहरियांे को मावजी बंदीग्रह में नजर आते इस प्रकार की चर्चा होती सुनकर राजा पूनः सेनिको को भीलवटा गांव भेजते है ओर मावजी महाराज को पूनः बंदी बना कर सैनिको के माध्यम से डंूगरपुर के गेपसागर की पाल पर लाया जाता है फिर राजा के द्वारा यह षर्त रखी जाती है कि आप इतने की चमत्कारीक है तो इस गेपसागर के पानी पर चल के बता दो। राजा के द्वारा इस तरह की बाते बार बार कह कर मावजी महाराज को अपनानित किया जा रहा था। ग्रंथो के आधार पर ऐसा माना जाता है कि भगवान राम हनुमान जी को त्रेतायुग में एक वचन दे कर गये थे कि कलयुग तक तुम्हे पृथ्वी पर जीवित रहना है। हनुमानजी का मंदिर गेपसागर के पाल पर ही बना हुआ है। हनुमानजी की उपस्थिति में मावजी महाराज का राजा के द्वारा अपमान किया जा रहा था यह उचित नहीं था लेकिन उस अपमान को हनुमान जी देख रहे थे मावजी महाराज भगवान विष्णु के ही अवतार है ओर हनुमानजी भगवान राम के द्वारा दिये गये वचन को भूल गये थे एंव हनुमानजी मावजी को पहचान नहीं पाये थे तब अपमान से भरे हुए मावजी ने हनुमानजी को थप्पड मारा था इसलिए जनश्रुति के अनुसार हनुमानजी का मुख दक्षिण दिषा से उत्तर दिषा की तरफ हो गया। विष्व में एकमात्र ऐसा मंदिर है जिसमें हनुमानजी का मुख उत्तर दिषा की ओर है, जो डूंगरपरु के गेपसागर की पाल पर स्थित है। इसके पष्चात् मावजी महाराज राजा के अपमान जनक बातों को सुनकर गेपसागर की पाल पर अपनी दोनों पादुकाएं उतार देते है ओर राजा को कहते है कि में तो पानी पर चल दुंगा लेकिन मेरे जाने के बाद 5 वर्षो तक इस गेपसागर में गधे चरेगंे अर्थात अकाल पडने जैसी भविष्यवाणी मावजी महाराज ने की। ओर इस प्रकार की भविष्यवाणी कर मावजी महाराज गेपसागर के पानी पर चल के सलुम्बर जिले के षेषपुर गांव में धोलागढ पर्वत पर जा कर बस गये ओर वहीं पर रहकर मावजी ने भविष्य वाणियां लिखी। एवं मावजी महाराज ने अपने दो परम् षिष्य जिवनदास एवं केहरीदास के द्वारा षेषपुर गांव से 42 मण कागज मंगवाये एवं षेषपुर वासियों द्वारा बेलगाडी में भरकर कागज को धोलागढ पर पहुंचाया गया। इसके पश्चात् मावजी महाराज ने उन 42 मण कागज से कुल 750 गुटके एवं 5 मुख्य बडे चोपडे लिखें जिसमें क्या हुआ है एवं क्या-क्या होने वाला इस तरह से कुल 72 लाख 66 हजार भविष्यवाणी को लिखा। उन 5 चैपडों की साईज 4 गुणा 2 है जो एक व्यक्ति के द्वारा न तो उठाया जा सकता है ना ही पन्ने को पलटा जा सकता है। इस प्रकार से इन चैपडों के माध्यम से भविष्यवाणीयां की, जो आज हम सभी इन से परिचित है।
यह भविष्यवाणियां इस प्रकार है जो आप पाठक पढ कर अंचभित हो जायेगें। मावजी ने जो भविष्यवाणी की है वह वर्तमान में सभी सत्य हो रही है। जिसमें कई तो हमारे सामने साबित हो चुकी है ओर कुछ भविष्यवाणियों के सत्य साबित होने में अभी समय है।
जे इस प्रकार हैं।


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